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कितना झूठ!!

कितना झूठ बोला जाता है हमसें....
जब बचपन में होते है तब कहा जाता है पढ़ लो सब पढ़ाई बारहवीं तक ही है उसके बाद फिर मौज ही है...जब बारहवीं तक पढ़ लेते है तब फिर एक बार हमसे झूठ बोला जाता है .. अब ग्रेजुएशन ठीक से कर लों.. नात- रिश्तेदार सब छोड़ो , ज्यादा सामाजिक भी मत बनो बस अपने काम से कम रखों और सिर्फ पढ़ाई करों।
फिर उस झूठ को हम बड़े आसानी से मान लेते है....
अधिकतर ग्रेजुएशन करने के लिए लड़को को शहर की तरफ रुख करना पड़ता है ,,, घर जाने के बहाने ढूढंने पड़ते है कि कैसे भी घर जाएं... पर फ़िर वहाँ भी एक झूठ बोला जाता है कि बाबू ऐसा है कि ई जो तुम्हारा घर परिवार का मोह-माया है इसे छोड़ो बस अपने कैरियर पर अब ध्यान केंद्रित करों...... रफ़्ता-रफ़्ता हम लोग भी अब उसी तरह के आदी हो जाते है ... मोह-माया को त   एकदमे त्याग देते है ...धीरे-धीरे करेजा को पत्थर करते हुई सब मोह भंग कर लेते हैं..... इतना की अब लोगो को कहना पड़ता है कि 'अब हमारा याद तुम्हे नही आता,जब हम फोन करेंगे तभी तुमसे बात होगी तुम फोन नही कर सकतें।'  अब हम उन्हें कैसे बताए कि आपने ही तो कहा की सब मोह-माया को भंग कर दो... अब जब कर दिए तो सारा दोष हमी लोगो पर मढ़ दिया जाता है ....
घर- गांव जाने के लिए तो त्यौहारों का सहारा लेना पड़ता है,कभी-कभी तो उसमें भी घर जाने से रोक दिया जाता है ... अरे पढ़ लो जब नौकरी-वोकरी करने लगोंगे.. तब त्यौहार मनाना... यहा तक आते आते झूठ की सीमा पार हो चुकी होती है .... फिर सवाल उलट दिया जाता है।
"आप भी नौकरी कर रहें है , पैसा कमा रहे है कितना वक्त आप परिवार के साथ और कितने त्यौहार आपने परिवार के साथ मनाएं है ।"
मुझे लगता है कभी कभी हमे पैसों के लिए अपने जड़ से अलग करने की साज़िश की जाती हैं और ये साज़िश हर निम्न-मध्यवर्गीय, और मध्यवर्गीय परिवारों में होता है ।
जब पेड़ से पत्ते अगल हो जाते है तो फिर उनका कोई अस्तित्व नहीं रह जाता है,, मिट्टी में दब कर मिट्टी के ही हो जाते है, अपने जड़ से अलग कौन होना चाहता है ?

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