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"ख़्वाब" (लप्रेक)

जिंदगी में तमाम ख़्वाब होते है,
उनमें से तुम्हारे साथ होना एक है।
तुम मेरी कविताओं की अधूरी अल्फाज़ हो तुम्हारे वगैर मेरी कोई कविता मुक़म्मल नही होतीं। जब भी लिखने की कोशिश करता हूं तुम ही ख्यालों में आ जाती हो और तुम्हारे इसी तरह आने से मेरी कविता मुक़म्मल हो जाती है।
जब भी मैं नदी के तट पर बैठता हुँ, धारा प्रवाह को एक टक देखते हुए तुम्हारे ही बारे सोचता हूँ... अब देखो न हम सिर्फ ऊपरी प्रवाह की गति को देख पाते है पर जो उसके भीतर हलचल होती है न ही हम उसे देख पाते है और न ही उसके बारे में सोचने की कोशिश करते है। सूर्य की किरणें जैसे जैसे मंद होती है ऊपरी सतह की गति वैसे-वैसे मंद होती जाती है पर नीचे की सतह पर,,,, उसपर इसका कोई प्रभाव नही पड़ता वो अपनी गति से बहती जाती है... तुम्हारे साथ भी मैं कुछ ऐसे ही बहना चाहता हूँ... किसी के प्रभाव से हमारे बहने की गति को प्रभावित ना करें।

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