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हरियाली

बसंत की बहार जा चुकी है चैत्र का महीना आ गया पेड़ों से पुराने पत्ते गिर गए हैं, सेमल के फूल अब अपने अंतिम पड़ाव में है चैत का महीना आते ही शरीर में चुनचुनाहट होने लगती है हमारे विश्वविद्यालय के कुछ साथियों को भी यह मौसम आते ही उनके अंदर की चुनचुनाहट को जगा देती है खासकर जब राष्ट्र गौरव और पर्यावरण अध्ययन के बारे में भी पढ़ना हो तो यह तो इसकी चिंता जायज होती है।
एक ,पर्यावरणीय छात्र होने के नाते हरियाली की चिंता उनके मन में सताने लगती है बेचैन कर देती है विश्वविद्यालय के एक छोर से दूसरे छोर की ओर चक्कर लगाते नजर आते हैं हरियाली गायब होने के कारण कहीं नई जगह नहीं मिलती मिलती बैठने के लिए ऐसे कई ठिकानों को नष्ट कर दिया जाता है चूंकि  मुख्य कैंपस में हम बीए वालो के अलावा कोई और इस समस्या पर चिंता नहीं सकता है , बीकॉम और बीएससी वाले सिर्फ एक बिल्डिंग से दूसरे बिल्डिंग तक ही  आते जाते हैं और इन्हें कोई मतलब नहीं होता बचे-खुचे ऑनर्स वाले  उनकी तादाद ही कम है वह सिर्फ अपने विषय में परिपूर्ण होते रहते हैं इन्हें भी इस समस्या से कोई लेना देना नहीं पर हम बीए वालों हमारी संख्या भारी तादाद बहुत अधिक अधिक है हमारी चिंता भी जायज है हरियाली की कटे पड़े पेड़ की टहनियों विश्वविद्यालय के एक छोर से दूसरे छोर काम के लिए जाना पड़ता है तो धूप की चुभन शरीर के रास्ते अंदर जाकर पसीना निकाल के परेशान करते हैं....

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