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कोहली❤️

 . साल था 2008 और तारीख़ थी 18 अगस्त श्रीलंका का दाम्बुला का क्रिकेट मैदान , जब एक 20 साल का नौजवान नीली जर्सी में जो अपने खेल का जौहर दिखा चुका था उसी साल फ़रवरी ।। हालांकि पहले मैच में मात्र 12 रन बनाया पर उस सीरीज में अपना झलक दिखा चुका था...कि क्रिकेट इतिहास में एक बेहतरीन खिलाड़ी मिलने वाला है। भारतीय क्रिकेट को द्रविड़,दादा,लक्ष्मण छोड़ चुके थे, टीम की कमान धोनी के हाथों में थी और एक साथ में थी एक युवा टीम। उस टीम में एक नौजवान था जो भारत को अंडर-19 क्रिकेटवर्ल्ड कप का खिताब दूसरी बार दिलाया था, नाम था 'विराट कोहली'.. वही कोहली जो 2008 में डेब्यू करने के बावजूद 2010 तक भारतीय टीम का परमानेंट मेम्बर नहीं बन पाया।  साल था 2009 ईडन गार्डन कोलकाता का मैदान श्रीलंका की टीम भारत के दौरे पर आयी थीं। तारीख था 24 दिसंबर उस कड़ाके की ठंड में कोहली का बल्ला आग उगल रहा था, वह  कोहली के बल्ले से वनडे क्रिकेट में पहला शतक था । कोहली के पास कुछ था तो वो था रनों की भूख,आक्रमता,उत्तेजना।  साल 2011 के वर्ल्डकप का पहला मैच 19 फरवरी बांग्लादेश के खिलाफ सहवाग जहाँ एक तरफ़ बेहतरीन पारी खेल...

कुफ्र रात

सब कुछ थम सा गया, रात आधी गुजर चुकी है बिस्तर  पर पड़ा हूँ कमरे में अँधेरा है सिर्फ एक चिंगारी जल रही है जिसमे मैं तुम्हारा अक्स देख पा रहा हूँ | झींगुरो की आवाजे तो एकदम सुनाई नहीं दे रहे है पता नहीं क्यों ? और तुम्हारी यादें मुझपर हावी हो रही है | इन सब के क्या मायने है मुझे नहीं मालूम, ये सन्नाटा  मेरे बिस्तर में सिमट रहा है छू रहा है मुझे पर कुछ मालूम नहीं हो रहा है ?? कुछ देर बाद मैं सो जाऊँगा, और मैं बस सोना चाहता हु | खिड़की से आ रही भीनी- भीनी रौशनी से मैं लड़ रहा हूँ | मै जानता हूँ कि  इनसे हार जाऊंगा पर फिर भी क्योकि मैं अब जिद्दी हो गया हूँ , पहले से ज्यादा | मैं जानता  हूँ मुझे मनाना कोई नहीं आएगा इसलिए अब मैं  गलतिया कर रहा हूँ , इन गलतियों में ही अपने आप को ढूंढ  रहा हूँ |  मुझे इन सब से फर्क क्यों नहीं पड़ता ये सब सवाल मै दफ़्न  करके बैठा गया हूँ | मैं वो सब कुछ हो गया हूँ जो मुझे नहीं होना चाहिए था | इन सब बातो से मुझे कोई गुरेज नहीं है, खैर बस एक चीज है की मैं जिन्दा हूँ और जिन्दा होने के लिए इतना ही काफी है | 

विश्वास

 ........'"विश्वास"..... . रिश्ते की वो नींव होती है जिसके संबल पर बड़े से बड़े इमारत मजबूती के साथ खड़े होते है पर जब विश्वास की एक भी ईट दरक जाएं न तब वो सारी इमारतें धराशायी हो जाते है जिन्हें हम विश्वास रूपी नींव पर खड़े किए होते है । अगर दुःख मापने के कोई पैमाना होता तो शायद स्वास टूटने की अपेक्षा विश्वास के टूटने पर अधिक होता। इस विश्वास रूपी इमरात का ढहना कइयों को मटियामेल कर देता है । और न जाने कितनों की ये जाने ले लेता है और लेगा भी। पिछले कुछ समय पर गौर करे तो इधर आत्महत्याएं की मामलों में वृद्धि हुई है । अगर हम उन सब मामलों में देखे तो इन सबका कारण यही है । सुशांत हो या सिद्धार्थ , या अनुपमा पाठक। अनुपमा के मामलें को देखे तो उन्होंने आत्महत्या करने के कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर लाइव आकर ही कहती है कि " यहाँ कोई किसी का मित्र नहीं है कोई भी आप का हितैषी नहीं जो बड़ी - बड़ी बातें करता है समस्या आने पर वही सबसे पहले हाथ खड़ा कर देता है । कोई किसी को समस्याओं को समझता ही नहीं है बल्कि समस्या बताने पर उपहास उड़ाने लगता है ।" दरअसल समस्या यही है कि कोई अगर मानसिक ...

तुम्हारे लिए ❤️❤️ - 2

. "तुम्हारे लिए". . हाँ आज फिर लिख रहा हूं तुम्हारे लिए .. लिखने की कोशिश कई दिनों से कर रहा था पर पता नही क्यूँ नहीं लिख पा रहा था .. आज कोशिश कर रहा हूँ शायद पूरा लिख सकूँ.. जबसे अपने पसंदीदा अभिनेता के इस दुनिया से जाने की खबर सुनी है मैंने तब से पता नही क्यूँ अजीब सी बेचैनी हो रही है  बिल्कुल उस दिन की तरह जब तुम मुझसे अलग हुई थी वो 4- 5 महीनों का वक़्त मेरे लिए 4- 5 सालों के बराबर था.. जब तुम्हे देखा था और तुम पहली नज़र में मेरे दिल मे घर कर गयी थी .. तुम्हारी वो मुस्कान जो मेरे ऊपर बिजली बन गिर पड़ी थी .. तुम हँस रही थी और मैं अपलक तुम्हे देख रहा था... सोचा कि इस डिजिटल जमाने मे तुम्हें मैं चिट्टी लिखूंगा.. पर सोचा हुआ कहा पूरा ही पाता है .. अगर होता तो न मैं आज  इस तरह लिखता और न ही लिख पाता ... याद है तुम्हे पिछली बार जब तुम्हारे लिए लिखा था तो कइयो ने तुम्हारे बारे में पूछा मुझसे की कौन है वो खुशनसीब जिसके लिए तुम लिखते हो.. पर तुम थी कहा तुम तो चली गयी थी दूर कहि दूर... वो वक़्त न मेरे वश में था और न ही तुम। तुम जा चुकी थी और मैं किसी से भी तुम्हारे बारे में कुछ भी नहीं...

सावन

गांव में दो महीने ऐसे होते है जब प्रकृति अपने सुंदरता के पराकाष्ठा पर होती है.. चारो तरफ मनमोहन दृश्य जिनमे गजब की आकर्षक शक्ति होती है इसी दरमियान मनुष्य प्रेम का सृजन भी खूब करता है। शहर में प्रेम के लिए वेलेंटाइन मात्र हफ़्ता जैसा ही बस होता और गांव में यहां तो फ़ाल्गुन और सावन जैसे  दो-दो महीने होते हैं, और इन महीनों में लोकगीतों का बड़ा महत्व होता है । भारतीय लोक परम्परा की ये बड़ी खूबी है कि यहाँ हर मौसम , हर कार्य के लिए अलग-अलग कई पारम्परिक गीत है । ख़ैर अभी सावन चल रहा है सावन के मौसम में कजरी गीतों का महत्व है  कजरी गीतों में वर्षा ऋतु का वर्णन विरह-वर्णन तथा राधा-कृष्ण की लीलाओं का वर्णन अधिकतर मिलता है। कजरी की प्रकृति क्षुद्र है । इसमें श्रृंगार रस की प्रधानता होती है। वक्त के साथ सब बदल गया है अब न कजरी सुनने वाले लोग है और न ही  सुनाने वाले लोग । और एक वक्त था जब बरही के लिए जद्दोजहद करके... एक दो जुन का खाना भौ उठा के नाक सिकोड़ कर कई बार विनती निहोरा करके मंगा लेते थे बार बार मान मनुव्वल करने के बाद बरही (रस्सी) आ जाती थी । फिर क्या न खाने की फ़िक्र न नहाने की प...

"त्यागपत्र" समीक्षा; - जैनेंद्र कुमार

पहली बार जैनेंद्र कुमार को पढ़ा... त्यागपत्र पढ़ते हुए.. मुझे निर्मला की त्रासदी याद आ गई .. जैसे जैसे मैं इस लघु उपन्यास को पढ़ रहा था... निर्मला की वो कथन याद आ गया कि .. दुःख में जलना तय है .. और दुःख ने निर्मला जैसे कइयो स्त्री को अपने आगोश में लीन कर लिया..। प्रेमचंद जी मे जिस तरह से स्त्री विमर्श की सशक्त गद्य गढ़ी है वह अद्भुत है .. और त्यागपत्र पढ़ते हुई मुझे लगा कि जैनेंद्र कुमार को स्त्री विमर्श पर प्रेमचंद के समकक्ष कहा जा सकता है अगर कोई बाध्यता न हो तो। इन स्त्रियों ने कर्तव्य निर्वाह करते हुए जिस प्रकार नैतिकता, मर्यादा का विश्लेषण किया, जिस तरह सामाजिक संरचना में रचे बसे पाखंड को तार तार किया वह भविष्य की अधिकारसंपन्न स्त्री के लिए रास्ता बनाता है। जैनेंद्र की इन स्त्रियों ने कहीं स्वेच्छा से अपना जीवन नहीं चुना है। अक्सर यही हुआ कि उनके मन की जो बात थी, मन में ही उसका दम घुट गया। लेकिन परिस्थितियों का सामना करने में इनके वजूद की जद्दोजहद प्रकट होती है। नियति की शिकार होने के बाद भी इन स्त्रियों ने अपने लिए रास्ते जरूर बनाए या कम से कम रूढ़ रास्तों से ऐतराज दिखाया। ... निय...

एक दिन..

और सुबह नींद खुली घड़ी में आठ बजे रहे थे... पहले मोबाइल की तरफ नजर गई तारीख आज 22 थी दिन रविवार और जनता कर्फ्यू का आह्वान । मोबाइल के नोटिफिकेशन चेक कर रहा था लगभग कईयों के मैसेज पढ़े थे कि आज घर में ही रहे घर से बाहर बिल्कुल ही ना निकले मैंने मोबाइल को दूर किया बिस्तर से उठकर बाहर बालकनी की तरफ निकल आया सामने गलियां एकदम सुनी थी बिल्कुल खामोश जो लखनऊ की गलियों की अदावत थी ही नहीं ...चिड़ियों की चहचहाने की आवाज कानों तक साफ़ आज पहुंच रही थी गाड़ियों की आवाजाही थम सी गई थी। गली में किसी चीज का आना नहीं हुआ कोई भी व्यक्ति बाहर नहीं निकला। एक अकेली पत्ती गली के छोर पर खड़े अमरूद के वृक्ष से अलग हुई और उस खामोशी ठहराव में गिर गई । जैसे एक सांकेतिक गिरना था संकेत था वस्तुओं में निहित एक शक्ति का जिसे आपने अनदेखा कर दिया एक छोर से दूसरे छोर तक सिर्फ दिख रही थी तो सिर्फ खामोशी और सुनाई पड़ रही थी तो हवा की सरसराहट और चिड़ियों की चहचहाहट। ______________ यक़ीन मानिए कभी कभी ऐसा कर्फ्यू भी जरूरी है .. आज शहर में रहते हुए पहली बार अनुभूति हुई कि शहर में भी लोग इस तरह रहते है ... जहाँ दिन ...

तुम्हारे लिए ❤️💕

तुम्हारे लिए❤️ टेबल लैंप जल रहा है कमरे में पर पता नहीं मुझे क्यों अँधेरा सा महसूस हो रहा हैं... रात एकदम मौन है कोई हलचल नहीं कोई उथलपुथल नहीं, जो भी कुछ भी चल रहा है वो सिर्फ मेरे दिल-ओ-दिमाग में चल रहा हैं.. आँखे झेंप रही है और सिर्फ तुम्हारे ही ख़यालात आ रहे है... उस दिन की तरह सादे लिबाज़ में तुम्हारा बदन मेरे बंद आँखों के सामने दिख रहा है ... मुझे पता नही तुम मेरा लिखा हुआ कभी पढ़ती हो या नहीं पर फिर भी मैं तुम्हारे ही ख्याल में डूबकर लिख रहा हूँ.. कहते है न कि उम्मीद पर दुनिया कायम है  बस इसी मूलमंत्र को गांठ बानकर लिख रहा हूँ, कि तुम जरूर पढ़ रही होंगी... सोचता हूँ कि काश ! उस दिन तुम मुझे न दिखी होती तो क्या होता.. क्या मैं इस तरीके से कभी लिख पाता...... मुझे पता नहीं..... जानती हो ! अक्सर मुझसे लोग सवालात करते है कि तुम किसके लिए लिखते हो... उस वक्त मैं एकदम मौन हो जाता हूँ जिस तरह ये रात मौन है.... काश उस दिन तुम्हारे वो मौन मुस्कान मेरे दिल मे घाव न किये होते .. वो सादगी उस दिन मुझे तुम्हारी तरफ आकर्षित नहीं की होती.. तो क्या होता ... क्या तब भी मुझे ये रात मौन से ही दि...

कितना झूठ!!

कितना झूठ बोला जाता है हमसें.... जब बचपन में होते है तब कहा जाता है पढ़ लो सब पढ़ाई बारहवीं तक ही है उसके बाद फिर मौज ही है...जब बारहवीं तक पढ़ लेते है तब फिर एक बार हमसे झूठ बोला जाता है .. अब ग्रेजुएशन ठीक से कर लों.. नात- रिश्तेदार सब छोड़ो , ज्यादा सामाजिक भी मत बनो बस अपने काम से कम रखों और सिर्फ पढ़ाई करों। फिर उस झूठ को हम बड़े आसानी से मान लेते है.... अधिकतर ग्रेजुएशन करने के लिए लड़को को शहर की तरफ रुख करना पड़ता है ,,, घर जाने के बहाने ढूढंने पड़ते है कि कैसे भी घर जाएं... पर फ़िर वहाँ भी एक झूठ बोला जाता है कि बाबू ऐसा है कि ई जो तुम्हारा घर परिवार का मोह-माया है इसे छोड़ो बस अपने कैरियर पर अब ध्यान केंद्रित करों...... रफ़्ता-रफ़्ता हम लोग भी अब उसी तरह के आदी हो जाते है ... मोह-माया को त   एकदमे त्याग देते है ...धीरे-धीरे करेजा को पत्थर करते हुई सब मोह भंग कर लेते हैं..... इतना की अब लोगो को कहना पड़ता है कि 'अब हमारा याद तुम्हे नही आता,जब हम फोन करेंगे तभी तुमसे बात होगी तुम फोन नही कर सकतें।'  अब हम उन्हें कैसे बताए कि आपने ही तो कहा की सब मोह-माया को भंग कर दो......

खिचड़ी और बचपन

"ए बाबू जाऽ त तनि हईं चाउर भुजा लावऽ" "ए माईं पहिले हमके गेहूं, अउर चना अगल से देबु भुजावे के तबे जाइबऽ हम" "भूजवा भूजइबऽ नाहीं त धोंधा कइसे खइबऽ, देखऽ खिचड़ी आ गइलऽ बा..." "नाहीं पहिले हमके अलगे से भुजावे के चना अउर गेहूं देबू तबे जाइब" "ठीक बा, पहिले चउरा भुजा लाव फिर अपना खातिर गेहूं अउर चना भुजा लिहऽ " अभी स्कूल से पढ़ कर आ रहे बस्ते को जैसे मैंने फेंका माँ का पहला फ़रमान यही था.... उस दौर में और आज के दौर में बहुत बदलाव आ गये है  खिचड़ी के कई दिनों पहले से ही धान को उबालने का काम शुरू हो जाता था लगभग हर घर की यही कहानी थी। उबालकर भुजिया चावल बनता था जिससे भूजा(लाई) बनता है। अब दौर बदल चुका है अब सब कुछ रेडीमेड उसकी जगह ले लिया है ... उ का है कि लोगो के पास वक़्त बड़ा कम है मानों कथाकथित .... हर गाँव मे एकाक चूल्हा जरूर होता था जहाँ लोग बड़े चाव से भुजिया चावल को भुजाने जाते थे.... और उस दौर में हम लोग तो ओर ज़्यादा उत्सुक रहते थे कि इसी बहाने हमे और भी काम नही करने पड़ेंगे.... स्कूल से आने के बाद एक ही काम सिर्फ.... कभी कभी तो उ...

गाँव

" अक्सर गांव पर वही लोग लिखते रहते है, कि गाँव बदल गया है जो पूर्णतः छोड़ चुके होते जिनके लिए गांव सिर्फ छुट्टी काटने और मौज करने के लिए ही सीमित रह गया और कहते है कि गांव अब बदल गया है " एक गांव में दो दोस्त थे, नाम था चेतन और आनंद, हर शाम उनकी मस्ती भरी रहती थी ठंडी गर्मी जाड़े की ज़रा भी उनको फिक्र नही होती थी,,,गर्मी के दुपहरी में कभी इस आम के पेड़ पर कभी उस आम के पेड़ पर चढ़कर उसपर लगे टिकोरे को झाड़ देते थे , आम के साथ साथ गालियां भी उन्हें नमक स्वरूप खानी पड़ती थी, सिर्फ गालियां ही सीमित नही थी बाकायदा चप्पल और डंडे की भी जबरदस्त मार पड़ती थी,,,, उन दोनों का बचपन बड़े मस्ती और शरारत के साथ बीता,,, पढ़ाई भी साथ में करते रहे उन मस्ती भरी जिंदगी के बीच कब उन दोनों ने इंटर पूरा कर लिया उन्हें पता भी न चला ,,, अब बारी थी शहर में जाकर पढ़ने की सो दोनों शहर की ओर कूच कर लिए, एक जज्बा था कुछ कर गुजरने का उन दोनों के अंदर, चूंकि होता क्या है कि आदमी दो ही तरह से अपने आप को स्थापित कर पाता है एक होता है क़िस्मत, पर उन दोनों के पास वो था नही अगर होता तो गरीब के यहाँ क्यो पैदा होते। द...

"ख़्वाब" (लप्रेक)

जिंदगी में तमाम ख़्वाब होते है, उनमें से तुम्हारे साथ होना एक है। तुम मेरी कविताओं की अधूरी अल्फाज़ हो तुम्हारे वगैर मेरी कोई कविता मुक़म्मल नही होतीं। जब भी लिखने की कोशिश करता हूं तुम ही ख्यालों में आ जाती हो और तुम्हारे इसी तरह आने से मेरी कविता मुक़म्मल हो जाती है। जब भी मैं नदी के तट पर बैठता हुँ, धारा प्रवाह को एक टक देखते हुए तुम्हारे ही बारे सोचता हूँ... अब देखो न हम सिर्फ ऊपरी प्रवाह की गति को देख पाते है पर जो उसके भीतर हलचल होती है न ही हम उसे देख पाते है और न ही उसके बारे में सोचने की कोशिश करते है। सूर्य की किरणें जैसे जैसे मंद होती है ऊपरी सतह की गति वैसे-वैसे मंद होती जाती है पर नीचे की सतह पर,,,, उसपर इसका कोई प्रभाव नही पड़ता वो अपनी गति से बहती जाती है... तुम्हारे साथ भी मैं कुछ ऐसे ही बहना चाहता हूँ... किसी के प्रभाव से हमारे बहने की गति को प्रभावित ना करें।

"जितिया"

"ये भईया उठऽ " "उऽ" "उठऽ माई बोलावत बा, परसादी खाए के" "चलऽ आवत हईं" "सात बज गइल हव माई अबहि ले पानी नाहीं पियले हव, चलऽ जब तू खईबऽ तब न माई पानी पी" हम उठ कर चल दिए जैसे माँ के पास पहुँचे आँख मलते हुए... वइसे माँ ने कहा "बाबू आ गइलऽ आव परसादी खा ल" "माई ब्रश कई के आवत हईं" "बाबू परसादी खइले मे बरश कइले हव या न इ ना देखल जाला" तब तक अचानक नींद खुली मोबाइल में देखा 7:30 हो रहा था,,,,, तब माँ को फ़ोन लगाया.. माँ से बस तो टूक ही बात हो पाई "हैलो" "माई नमस्ते" "खुश रह बेटा तोहार सब मनोकामना पूरा होखे" "का होत बा" "बस अब पानी पियें जात हईं, देख तवले तोहार फोन आईये गइल" "ठीक बा माई पानी पी ल फिर हम बाद में बात करत हईं" बस इतना बात करके फोन काट दिया.. फिर मन मे वही उठापठक चालू आखिर हम शहर आने को क्यो मजबूर होते है ? गाँव जो हमे संस्कार सिखाता है वही शहर उस संस्कार से हमे कहि दूर ले जाता है एक तरह से हमारे संस्कार को नष्ट भी कर रहा है. ...

"कोहबर की शर्त"

'कोहबर' विवाह के रस्म अदायगी में एक पड़ाव जहाँ शादी के पश्चात पहली बार वर वधु मिलते है साथ में जवार की लड़कियां और महिलायें रहती, पुरुष में वर और शाहबाले के अलावा और कोई नही होता है । हँसी ठिठोली और कई तरह के खेल खेलाये जाते है और जो जीतता है वह हारने वाले से कुछ न कुछ शर्त करता है । उपन्यास "कोहबर की शर्त" आंचलिक भाषा पर आधारित एक उपन्यास है जिसके मुख्य पात्र चंदन और गुंजा के प्रेम और बलिदान पर आधारित है। कहानी इतनी संजीदगी से गढ़ी गई है कि आप की आखों को भी नम कर देती है, जैसे-जैसे आप उपन्यास को पढ़ते जाते है सामने वो छवि , आकृति बनती जाती है यह आकृति एक स्वप्न है। विवाह की रात कोहबर के रस्म में चलने वाली नोक-झोंक जो कुछ इस तरह है.... "बहिरे हो क्या,पहुना?या अपनी बहन को याद आ रही है?" "हम क्यो अपनी बहन को याद करे! हमारे तो कोई बहन भी नही है। हम तो दूसरे की बहन लेने आये है!" बारह साल का चंदन तपाक से जवाब देता है । कोहबर की वो नोक-झोंक दोनों को एक ऐसे रास्ते पर लाकर खड़ा कर देती है जो जाकर उस सागर में गिरता जिसे लोग प्रेम, मोहब्बत, इश्क और चाहत कह...

शादियों में गाने

शादियों का मौसम चल रहा है, उतनी ही तेजी से छौंका के साथ गर्मी भी लगा रहा है ...... जून के महीने में गर्मी अपने चरम पर होती है, शादी के इस मौसम में बारिसों का संसय बना रहता है , शादी करने वाले कि जी हलकान में रहती है कि कब बारिस हो जाए और कब उनके ख्याबो की उस सजावट पर पानी  फेर दे..... ...  .... .. शादियों के मौसम में पहले हिंदी के रोमांटिक युग के गानों का बोलबाला होता था ,,..... "वादिये इश्क़ से आया है मेरा शहजादा" जैसे गानों से लेकर "थम के बरस जरा थम के बरस मुझे महबूब के पास जाना है " मेघ देव भी रुख़ जाते थे और बारिस की बूंदे जरूर पड़ जाती थी, खासकर के जून के महीनों में.... अब धीरे-धीरे ट्रेंड बदला  हिंदी गानों के जगह आधुनिक भोजपुरी चरितार्थ के गीत बजने लगे है .... वह गाने जो नाच के मंच को सुशोभित करते थे अब वह शादिये के मंडप तक गूंजते है...... "पियवा से पहिले हमार रहलु" से लेकर "देवर करी घात ए राजा" तक... यही तक सीमित नही रहता है "रात दिया बुता के पिया क्या-क्या किया" जैसे गानों से प्रश्न भी पूछ लिया जाता है .....इन सब से मेघ...

गांव के लड़के…

हम गांव देहात के लड़के, गर्मी के दुपहरी में एसी और कूलर नही ढूढ़ते है,बस जहाँ ही पेड़ की छांव मिल जाये वही खाट डालकर लेट जाते है, मठलाते है और कान में ठेठी डाल कर शहर से बिल्कुल अलग अंग्रेजी गानों से कहि दूर हिंदी और भोजपुरी गानों को मदमस्त वाला होके उसी खाट पर हिलकोरे लेते रहते है , ये मात्र एक गांव की छवि नही बल्कि कई गांवों में अमूमन ऐसी छवि देखने को मिल जाएगी, जहाँ हम जैसे लौंडे रहते है, शहरो में भौकाल मारने के लिये जस्टिन बीबर, अर्जित,मलिक का गाना सुन ले मगर घर की खटिया पे सिर्फ मनोज तिवारी, निरहुआ ,पवन और खेसारी का ही गाना याद आता है, एमा,कैट्रीना तो बस हमे मूवी में ही अच्छी लगती है असल जिंदगी में हमे तलाश है तो काजल राघवानी और आम्रपाली दुबे जैसी......लेकिन अपना छोटा सा गांव अपनी आँखों में ले कर चलता हूं सड़क के किनारे हमे खड़े होकर जूस पीने से लेकर लिट्टी चोखा खाने तक मुझे कोई हिचकिचाहट नही होती क्योकि भईया हम है लोअर मिडिल क्लास फैमिली और संकोच हमारे होमोग्लोबिन में तैरता है जैसे ........ #गाँव #घर #देहाती_लड़के

विश्वविद्यालय

आज विश्वविद्यालय के सत्र का आखिरी दिन था , और हम लोगो के बीए प्रथम वर्ष का, सो जो मन मे हर्षोल्लास रहता है उसकी एक अलग सीमा होती, घर गांव जाने की उन एक साल के बेहतरीन यादों को समेटने की जब गांव से कोई लड़का एक स्कूल, कालेजों से एक बड़े शहर के विश्वविद्यालयों में प्रवेश करता है जो महज सौ हज़ार की भीड़ का सामना किया होता है और अचानक हजारों हजार की भीड़ को देखता है तो सिर्फ देखते रह जाता है आँखे फाड़ के एक टकटकी निगाह से ढूढ़ता रहता है शायद कोई अपना मिल जाये। विश्वविद्यालय में आने के पश्चात कुछ हो या न हो एक काम जरूर होता है कि लड़का पहिले अपना क्षेत्रवाद साधता है भले ही उसे युपी के सारे जिलों का नाम पता ह्यो या न हो,,,,, और साधे ही न क्यो चूंकि अपनी भाषा और संस्कृति से दूसरे भाषा और संस्कृति में एडजस्ट नही कर पाता है । यही हाल अपना भी रहा ....   जारी✍️✍️

मेरी माँ ( मातृ दिवस )

 अनपढ़ है पर, मेरे चेहरे को खूब पढ़ती है, वह मां ही है जो मेरे हर दुख में सिसकती है मैं खाना खाया या नहीं हमेशा पूछती है चाहे उसके पास रहूं या उससे कोसों दूर पहले जब मैं छोटा था, अपने सारे कामो को छोड़ कर मेरे लिए सुबह जल्दी खाना पकाती थी कहीं देर ना हो मेरे स्कूल जाने की। अब भले ही बड़ा हो गया हूं घर से कोसों दूर हो गया हूं पर जब भी घर जाता हूं माँ पहले मुझे खाना खिलाती है फिर अपने खाती है चाहे देर रात से कहीं से घूम कर आउँ या देर दोपहर में। भले ही अनपढ़ है पर मेरे चेहरे को पढ़ती है वह मां ही है जो मेरे हर दुख में सिसकती है मुकेश आनंद 12/04/2019

हॉनर किलिंग

"इश्क पर जोर नहीं है वो आतिश गालिब  कि लगाए न लगे और बुझाए न बुझे"  पता नहीं कौन सी इज्जत और सम्मान के लिए लोग कत्लेआम करते हैं जिसे ऑनर किलिंग कहते हैं।  चाहे वह एक मजहब के हो या अलग-अलग मजहब के पर इन सब मामलों में हमारा समाज आज भी पीछे हम हर तरफ से तो विकसित हुए हैं पर ये गंदी सोच लोगों के जेहन से नहीं निकल पाए हम लाख गुना पढ़-लिख और एक आदर्श समाज की कल्पना करें पर जो सामाजिक रूढ़ियां हैं जिससे  हम ऐसे किसी भी आदर्श  समाज का निर्माण नहीं कर सकते । जो भी समाज सुधारक हैं सब ने अंतर्जातीय विवाह की वकालत की पर वह कभी समाज ने स्वीकार नहीं किया  जब कन्या भ्रूण हत्या और बाल यौन शोषण का मामला आता है तब वह इज्जत का ख्याल क्यों नहीं आता इज्जत हमें तभी याद आती है जब लड़की अपने मन से शादी करती है.........

हरियाली

बसंत की बहार जा चुकी है चैत्र का महीना आ गया पेड़ों से पुराने पत्ते गिर गए हैं, सेमल के फूल अब अपने अंतिम पड़ाव में है चैत का महीना आते ही शरीर में चुनचुनाहट होने लगती है हमारे विश्वविद्यालय के कुछ साथियों को भी यह मौसम आते ही उनके अंदर की चुनचुनाहट को जगा देती है खासकर जब राष्ट्र गौरव और पर्यावरण अध्ययन के बारे में भी पढ़ना हो तो यह तो इसकी चिंता जायज होती है। एक ,पर्यावरणीय छात्र होने के नाते हरियाली की चिंता उनके मन में सताने लगती है बेचैन कर देती है विश्वविद्यालय के एक छोर से दूसरे छोर की ओर चक्कर लगाते नजर आते हैं हरियाली गायब होने के कारण कहीं नई जगह नहीं मिलती मिलती बैठने के लिए ऐसे कई ठिकानों को नष्ट कर दिया जाता है चूंकि  मुख्य कैंपस में हम बीए वालो के अलावा कोई और इस समस्या पर चिंता नहीं सकता है , बीकॉम और बीएससी वाले सिर्फ एक बिल्डिंग से दूसरे बिल्डिंग तक ही  आते जाते हैं और इन्हें कोई मतलब नहीं होता बचे-खुचे ऑनर्स वाले  उनकी तादाद ही कम है वह सिर्फ अपने विषय में परिपूर्ण होते रहते हैं इन्हें भी इस समस्या से कोई लेना देना नहीं पर हम बीए वालों हमारी संख्या भार...